खुबसूरत यादो मे सामिल हो तुम

अब जो बिझड़ रहे है तुमसे न जाने कब मिलना होगा
तेरी मन्जिल कही और मेरा ठिकाना कही और होगा
हा दस्तुर इस बात का जरुर हो जब कभी मिलना हो 
सिकायते एक दुसरे से न हो
तू खुद की दुनिया मसरुफ रहें इतना की किसी भी शाम मेरी यादो का न हो 
अब जो बिझड़ रहे है तुमसे न जाने कब मिलना होगा
अब इन आँखों का तलबगार कोइ और होगा
अब तेरी आँखों का नूर किसी औंर का होगा
अब तेरी मुस्कुराहटों का निगहबान कोइ और होगा
हा बेसक बिझड़ रहे तुझसे मगर थैक्यू उन खूबसूरत यादो के लिए जो तुम्हारे बिना मुकम्मल नही होती
अब जो बिझड़ रहे है तुमसे न जाने कब मिलना होगा

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